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When we try to understand mystery of life and get puzzled, is a solution there comes a light of divine knowledge which is called VEDIC JYOTISH.

Sudden death of young son, bereavement of dearest person lest in the crowed immense derive for son, accident in the way, birth of disabled child; gain of everything without effort for someone, happening of bad things selectively, uncalled on thought diseases like cancer, failure of kidney etc. disturbance or separation of married life and so many things alike are such problems/ question which have its answer only in Astrology Science.

दिव्यं चाक्षं गृहाणाम् च दर्शितम् ज्ञानगुत्तमम् ‌‌​‌‌​‌ |
विज्ञायाकॊदि लोकेषु स्थानम् प्राप्नोति शाश्वतम् ‌​‌||

The meaning of above quote is that the knowledge of Astrology is marvelous and person having attained this finds top most place in Divya Loka and Surya Loka.

Theory of यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे(behavior of external objects over mortal body and universe are alike.)

The ancient Indian says (Rishis) had well understood this fact that same principal works in between smallest things and universe. For example we know that formatting of a molecule and sun solar system is the same. As electron under round is the nucleus of atom in their different orbits similarly plants round the sun in their different orbits. This truth has also been revealed in Katho panishai as follows-

अणोरणियान महतो महीयान | आत्मस्य जन्तोर्निहिंतो गुहायाम्
It means that same detriment work in smallest things and big universe as well. This reveals that they influence each other. As such impact of planet on human body is a must.

Impact of Planets on human body

When a child is born on earth, all such planets, sub planets surrounding the earth and even stars in the sky start leaving their impact over the mind and body from the very weakness, strength capabilities in the child get influenced.

OSHO while explaining that act of Astrology tells that there is an energy field around the body and this becomes active from the very moment of exposer of body during birth time.

ओशो ने ज्योतिष के पूर्ण प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा है कि हमारे चारो ओर उर्जाओं के क्षेत्र है, जो पूरेसमय हमें प्रभावित करते हैं । एक बच्चे के जन्म को वैज्ञानिक भाषा में हम एक्स्पोजर कह सकते है । यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार एक फिल्म को हम कैमरे में एक्स्पोसे करते हैं । एक क्षण के लिए कैमरे का शटर दबाते हैं, कैमरे की खिड़की खुलती है और बंद हो जाती है | उस क्षण में जो भी कैमरे के समक्ष आ जाता है, वह फिल्म पर अंकित हो जाता है, अब दूसरा उस पर कुछ भी अंकित न होगा |

स्वामी विशुद्धानंद द्वारा प्रतिपादित सूर्य सिद्धांत - ग्रहों राशियों और नक्षत्रों का हमारे शरीर पर कैसे प्रभाव पड़ता है, इस प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर हमे स्वामी विशुद्धानंद द्वारा प्रतिपादित 'सूर्य सिद्धांत' से प्राप्त हो जाता है |

प्रसिद्ध शोधकर्ता पाल ब्रंटन के समक्ष स्वामी जी ने एक मृत पक्षी को थोड़े समय के लिए जीवित कर दिया था | जीवित करने कि यह प्रक्रिया उन्होंने सूर्य किरणों को एक लेंस से संयोजित करके किया था और यह सिद्ध किया था कि सूर्य किरणों के साथ जीवन कि धरा भी प्रकाश कि गति के साथ प्रवादित होती रहती है | इस गह्तना का विवरण पाल ब्रंटन ने अपनी पुस्तक ' ए सर्च इन सेक्रेट इंडिया ' में दिया है |

महर्षि वेद व्यास द्वारा कर्म और भाग्य के सिद्धांतो का विवेचन - "प्रबल पुरुषार्थ करने से पहले का किया हुआ भी कोई कर्म बिना किया हुआ सा हो जाता है और वह प्रबल पुरुषार्थ ही सिद्ध होकर फल प्रदान करता है | इस तरह पीछे का किया हुआ पुण्य या पाप कर्म अपने यथार्थ फल को नहीं दे पाते |

जैसे थोड़ी सी आग वायु का सहारा पाकर बहुत बड़ी हो जाती है | उसी प्रकार पुरुषार्थ का सहारा पाकर भाग्य का बल विशेष बढ़ जाता है |

जिस प्रकार तेज समाप्त हो जाने से दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्म (पुरुषार्थ) के क्षण हो जाने पर भी नष्ट हो जाता है |

इस जीव जगत में उद्योगदीन मनुष्य कभी फलता- फूलता नहीं दिखाई देता | दैव (भाग्य) में इतनी शक्ति नहीं है कि वह उसे कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर लगा दे | जैसे शिष्य गुरु को आगे करके चलता है, उसी तरह दैव (भाग्य ) पुरुषार्थ को ही आगे करके स्वयं उसके पीछे चलता है | किया हुआ पुरुषार्थ ही दैव को जहा चाहता है वहा ले जाता है | महर्षि वसिष्ट द्वारा कर्म और भाग्य के सिद्धांतो का विवेचन - वसिष्ट सिद्धांत के प्रणेता महर्षि वसिष्ट ने भी इस प्रश्न पर विचार करते हुए कहा है कि - "दोनों (पुरुषार्थ और भाग्य) दो गेढ़ॊ के समान एक दुसरे के साथ युद्ध करते है और जो उनमे अधिक बलवान होता है, वही विजय पाता है | 'जिस प्रकार कल का बिगड़ा हुआ काम आज के प्रयत्न से सुधर जाता है इसी प्रकार वर्त्तमान समय में किया हुआ पुरुषार्थ पूर्व के किये गए कर्मो (जिससे दुर्भाग्य उत्पन्न हुआ) को सुधार सकता है ' इसलिए मनुष्य को इतना पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे उसके पूर्व काल के अशुभ कर्म शांत हो जाये ।

आकस्मिक अथवा संयॊगवश घटने वाली घटनाओं के ज्योतिषीय कारणों का विवेचन - विश्व विख्यात विचारक आर्थर कोसलर ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक रूट ऑफ को इन्सीडेंन्स (रूट्स ऑफ़ को-इन्सिडेन्स ) में आकस्मिक घटनाओं पर अपना गहन विचार प्रस्तुत करते हुए कहा है कि - विराट सृर्ष्टि में सर्वत्र नियम और व्यावस्था का सिद्धांत काम कर रहा है, जिन्हें हम संयॊग समझते है, वह भी किसी न किसी अज्ञात नियमों से अपरिचित होने के कारण ही ऐसी घटनाओं को संयॊग की संज्ञा दी जाती है ।

वास्तव में ज्योतिर्विज्ञान का यह उद्देश्य है कि वर्तमान कि स्थिति तथा भविष्य की सम्भावनाओं को इस विज्ञान के आधार पर जानकर किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचा जा सके ।


Astrologer: Dr. Seema Shree Mobile: +91-8009188309 E-Mail: astroseemashree@gmail.com Charges: Rs.3000/-
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